Chelaiya Dham Bilkha Junagadh| चेलैया धाम -बिलखा

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Chelaiya Dham Bilkha Junagadh| चेलैया धाम -बिलखा


नमस्कार मित्रों आज हम आपको जूनागढ़ के पास  आया हुए चेलैया धाम के बारे में बताने वाले हैं । इस नाम के पीछे बहुत बड़ी कहानी छिपी हुई है ।(Chelaiya Dham)

दानवीर कर्ण।

   महाभारत के समय में सबसे महान दानवीर कर्ण था । कर्ण का एक नियम था कि वह हर सुबह उठेगा और उसके महल के सामने जो कोई भी ब्राह्मण या कोई भिखारी आएगा उसको दान करेगा । और उस दान मैं कपड़े और अन्नदान नहीं परंतु सुवर्णा मतलब सोने का दान करेगा। ऐसे करते-करते बहुत बार दान किया इसीलिए उसको दानवीर नाम से जाना गया ।

उस के दरबार में जो भी आता था वह खाली हाथ नहीं जाता था । अब उसका  देवलोक जाने का समय हो गया वह अपनी सब मोह माया छोड़ कर देवलोक गया । देवलोक मतलब स्वर्ग । स्वर्गवासी ने कर्ण का बहुत आदर से सम्मान किया । स्वागत करने के बाद जब उसका भोजन करने का टाइम हुआ तब उसको भोजन के लिए थाली दी । और भोजन के अंदर अन्न नहीं परंतु सोने के टुकड़े पीरेस ने  में आए ।

भोजन में सोना (gold ) क्यों परोसा ?

और दूसरे लोगों को भोजन प्रदेश ने में आया ।कर्ण यह देखकर आश्चर्य हो गया और उसने धर्म राजा को  बोला कि लोगों को अन्न दीया और मुझको सोना ऐसा क्यों । मैं सोने को थोड़ी खा सकता हूं । और स्वर्ग  के अंदर तो सोने की दुकान भी नहीं होती जिसको मैं बेचकर अनाज खरीद सकूं । फिर धर्म राजा ने करना को कहा कि तूने अपने जीवन के अंदर सुवर्णा दान किया है । इसीलिए आपको सोने को परोसा में आया है ।कर्ण वापस सोच में पड़ गया और धर्मराज को प्रार्थना की कि मेरे को वापस पृथ्वी लोक पर भेजो मैं अपनी भूल स्वीकार ना चाहता हूं और अन्न का दान करना चाहता हूं । 

कर्ण ने पुनः जन्म क्यों लिया ?


     उसी समय कर्ण का दूसरा अवतार जूनागढ़ जिले के अंदर बिलखा गांव के पास सेठ सगडसा  सा नाम से हुआ । 1200 साल पहले की यह बात है ।कर्ण ने अवतार लिया और उनका विवाह संगवती से हुआ । वह अपने नगर के नगर सेट होने के कारण उनके पास पैसों की कमी नहीं थी । वह हर समाज के सभी लोगों को भोजन कराते थे । और उनकी पत्नी ने ऐसा वचन लिया था कि किसी भी साधु को भोजन कराने के बाद ही भोजन करने का ।1 दिन के बाद है वहां पर बहुत भयंकर तूफान आया ।

तूफान आने की वजह से सब अपने अपने घर के अंदर से । बहुत दिनों तक यह बारिश और तूफान चला । फिर एक गांव वासी ने बताया तालाब के पास में एक अघोरी साधु बैठा हुआ है । यह बात सुनकर सगड़सा सेठ साधु महाराज को लेने के लिए गए । सेठ ने उस साधनों के चरण स्पर्श किए ।

सगडसाने अघोरी को भोजन के लिए आमंत्रित किया ?

फिर उनको बोला कि महाराज आप मेरे घर चलो और मेरे घर पर भोजन करो । अघोरी साधु को किसी प्रकार की बीमारी थी उसने सेट को कहा कि मैं ऐसा आपके घर नहीं आ सकता । सेठ ने बोला ऐसा कुछ नहीं है आप चाहो तो मैं आपके लिए घोड़ा गाड़ी मांगा हूं । साधु ने मना कर दिया । साधु को मनाने के लिए सेट की पत्नी संगवती बड़ी सी टोकरी लेकर आई । और साधु महाराज का आशीर्वाद लिया और उनको कहा कि आप हमारे घर पधारे । साधु महाराज टोकरी के अंदर बैठ गए ।

और सेठ उनको उठाकर अपने घर के तरफ ले गए । जब सेठ उनको उठा कर ले जा रहे थे तब भगवान ने लीला करी । साधु महाराज के शरीर में से रक्त की धारा वही हुई । फिर साधु को घर पे ले आते हैं । और उनको पवित्र जल से स्नान करवाते हैं और उनको पहनने के लिए अच्छे से वस्त्र भी देते हैं । और एक अच्छा सा आसन में उनको बिठाते हैं । और उनके भोजन के लिए माता संगवती भोजन बनाती है । भोजन बनाकर महाराज को भोजन देते हैं । और महाराज को दो हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि आप भोजन ग्रहण कीजिए

अघोरि ने भोजन में क्या मांगा ?(Chelaiya Dham)

    साधु ने इस भोजन के सामने देखकर मना कर दिया । और साधु ने कहा कि हम ऐसा भोजन नहीं करते । हम लोग तो अघोर पंथ के है । हम लोगों को तो मास में से बनी हुई रसोई चाहिए । यह सुनकर सेठ ने कहा कि हमारे घर में ऐसा भोजन नहीं बनाते । यह सुनकर साधु महाराज क्रोधित हो गए और सेठ को बोला कि आप मुझको इधर क्यों लाए मैं तालाब के पास अच्छा था बड़ा है साधु को भोजन करवाने । सेठ सोच में पड़ गए और गांव में मांस की दुकान पर जाकर मांस ले आए और उसको बनाकर भोजन मैं दिया । और दो हाथ जोड़कर वापस भोजन करने के लिए विनंती की । साधु महाराज ने कहा कि यह तो कोई पशु का मांस है ।

मैं कोई पशु का मांस नहीं खाता मेरे को तो किसी इंसान का मांस चाहिए । और वह भी किसी व्यक्ति का जो मेरी आंखो के सामने बलिदान दे । सेठ ने अपनी पत्नी से कहा कि मैं भगवान के सामने कमल बलि  करूंगा । और मेरा मांस साधु महाराज को खिला देना । फिर उनकी पत्नी ने कहा कि आप की जगह मैं मर जाती हूं । तो सेठ ने बोला मेरे को स्त्री हत्या का पाप लगेगा । 

भगवान विष्णु ने साधु का रूप क्यों धारण किया ?


   यह दोनों बात कर रहे थे तो महाराज सुन गए । और साधु ने कहा कि जो भी करना है जल्दी करो । और साधु ने सेठ को कहा कि आपकी कोई संतान है । उन्होंने कहा 8 साल का एक बच्चा है । जो अभी आश्रम में पढ़ने के लिए गया है । साधु महाराज ने कहा तो तो इसका ही मास मैं खाऊंगा । और वैसे भी अघोरी लोगों को बालक का मांस बहुत पसंद होता है । भगवान ने एक दूसरी लीला करें साधु का रूप धारण करके सेठ के बेटे चेलैया के  आश्रम में गए । साधु  ने चेलैया को कहा कि तुम यहां से जल्दी से भाग जाओ तुम्हारे घर पर कोई साधु आया है उसका भोजन के अंदर तुम्हारा मांस चाहिए । अपनी जान बचाने के लिए आए यहां से भाग जाओ । 

बालक ने  साधु महाराज को कहा की ऐसा होगा तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा । उस साधु ने चलाया को मनाने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं माना । 

चेलैया ने अपना मस्तक क्यों काटा ?


चेलैया आश्रम से अपने घर जाता है और अपनी मां से मिलता है । और उनकी माता बेटे को हल्दी से नहीं नेहलाते हैं और पिता उस के साथ बहुत ही रोते हैं । चेलैया ने अपने पिता को कहा कि मेरे को सब कुछ पता है । आप मेरे को तलवार दीजिए मैं अपने आप ही अपना मस्तक काट दूंगा । और इतनी देर मे बाजू में रखे तलवार को लेकर अपना मस्तक काट दिया । और इस मस्तक को साइड में रख कर अपनी पत्नी को आदेश दिया इससे साधु के लिए रसोई बनाओ और उनको खुश करो । और बाद में बेटे का अंतिम संस्कार करेंगे । रोते-रोते माता ने भोजन बनाया और साधु को हाथ जोड़कर कहा कि भोजन कीजिए ।

फिर साधु महाराज ने कहा आप लोगों ने तो मल मूत्र की काया से मेरा भोजन बनाया जो खाने लायक था वह तो आपने रख लिया । माता ने बोला महाराज आप जो कहेंगे वह करेंगे आप बताइए अब हम क्या करें । साधु महाराज ने कहा आपके बेटे के सिर को खंडो और योग करते करते आपके आंख में से आंसू नहीं आने चाहिए । अगर आप में आंख में से आंसू आया तो मैं भोजन  ग्रहण नहीं  करूंगा ।

सेठ और उनकी पत्नी ने भगवन विष्णु से क्या वरदान मांगा ?


   सेठ और उनकी पत्नी ने उसके बेटे के मस्तक को खंडा । और साधु महाराज को भोजन में परसा । थोड़ी देर में आकाश में से प्रकाश आया और साधु महाराज ने सेठ और उनकी पत्नी से माफी मांगी और साधु महाराज ने अपना असली रूप बताया । विष्णु भगवान ने  सेठ और उनकी पत्नी से वरदान मांगने के लिए कहा । उन्होंने कहा कि आपने हमारी परीक्षा की वैसे इस दुनिया में किसी की मत करना । और हमारा बेटा चेलैया को वापस दो । थोड़ी देर में चेलैया आश्रम से वापस आया और उनके माता-पिता को गले लगाया और भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो जाते हैं । इस गांव के अंदर आज के समय में भी चलाया का मस्तक जिस खंडनी में खंडा था वह भी पड़ा हुआ है । तो ऐसे थे हमारे सौराष्ट्र के संत ।

chelaiya dham darshan timing

monday to sunday – 7 Am to 8 Pm

How to Reach Chelaiya Dham ?

• By Air

Nearest Airport is keshod 58 km and Rajkot 115 Km

• By Train

Nearest Railway Station is junagadh 22 km.

• By Road

Nearest Busstop is junagadh 25 km .

Junagadh to Chelaiya Dham is 25 km.

  • Rajkot to Chelaiya Dham is 123 km.
  • somnath to Chelaiya Dham is 93 KM.
  • virpur to Chelaiya Dham is 67km.
  • chotila to Chelaiya Dham is 168 km.

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